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International Journal of Applied Research
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Vol. 5, Issue 2, Part C (2019)

समाजीकरण में योग का समन्वय एवं उसके विविध स्वरूप

समाजीकरण में योग का समन्वय एवं उसके विविध स्वरूप

Author(s)
आर एन त्रिपाठी
Abstract
एक नवजात शिशु हांड मांस के लोथड़े के रूप में मात्र जैविक उत्पाद होता है। समाजीकरण की प्रक्रिया से वह पूर्ण मनुष्य बनता है। समाजीकरण के विभिन्न अभिकरण हैं और उन अभिकरणों के माध्यम से ही व्यक्ति को सामाजिक प्राणी के रूप में जीने के पूर्णता प्राप्त होती। जैविक एवं मानसिक रूप से स्वास्थ्य अत्यंत महत्वपूर्ण है, जिसे जन्म के बाद योग की क्रिया से प्राप्त किया जा सकता है।जिसका वर्णन हमारे प्राच्य ग्रंथों में विषद रूप से मिलता है। हमारे ऋषियों मनीषियों ने इसे बहुत पहले जान लिया था और इसके विविध स्वरूपों का समुचित अध्ययन कर उसे मानवोपयोगी बनाने की शिक्षा शुरू कर दी थी आज आवश्यकता है समाजीकरण के प्राथमिक अभिकरण है घर, परिवार, विद्यालय, अध्यापक सभी को योग की शिक्षा प्रारंभिक तौर पर लेनी चाहिए और देनी चाहिए क्योंकि स्वस्थ मस्तिष्क स्वस्थ शरीर में ही संभव है, और किसी भी देश की पूंजी उसके सुयोग्य नागरिक ही हैं।इस शोध पत्र में योग के विभिन्न स्वरूपों का और योग की ऐतिहासिक उपादेयता पर विचार किया गया है।
Pages: 342-344  |  186 Views  80 Downloads


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How to cite this article:
आर एन त्रिपाठी. समाजीकरण में योग का समन्वय एवं उसके विविध स्वरूप. Int J Appl Res 2019;5(2):342-344. DOI: 10.22271/allresearch.2019.v5.i2c.12839
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