Vol. 10, Issue 7, Part C (2024)
दलित समाज की अस्मिता: मुक्तिपर्व
दलित समाज की अस्मिता: मुक्तिपर्व
Author(s)
डाॅ0 राजकुमार
Abstract
वर्तमान समय में दलित समाज ने हिंदू धर्म-ग्रन्थों द्वारा थोपी गई तमाम पाबंदियों को नकारना आरम्भ कर दिया है, जिसका प्रभाव दलित साहित्य पर भी देखने को मिलता है। साहित्य एवं समाज का घनिष्ठ सम्बंध होने के कारण संपूर्ण दलित समाज का चित्रण दलित साहित्य के माध्यम से चित्रित किया गया है। मोहनदास नैमिशराय द्वारा रचित ‘मुक्तिपर्व’ में देश की आजादी के बाद दलितांे में उत्पन्न होते अस्मिता के भाव एवं आत्मसम्मान को दिखाया गया है। आजादी से पूर्व दलित वर्ग सामाजिक एवं सांस्कृतिक रूप से गुलाम था। वह दोहरी गुलामी की जिंदगी झेल रहा था। दलित वर्ग किसी एक व्यक्ति या वर्ग द्वारा शोषित न होकर दोहरे शोषण का शिकार था। एक तरफ ब्रिटिश एवं मुस्लिम समाज द्वारा तथा दूसरी ओर हिन्दू समाज द्वारा शोषण का शिकार था। देश की आजादी के समय दलित वर्ग असमंजस की स्थिति में था, क्योंकि वह यह नहीं समझ पा रहा था कि आखिर उनका दुश्मन कौन है।