Vol. 10, Issue 9, Part D (2024)
हिन्दी के आरंभिक दौर के जीवनीपरक उपन्यास और उपन्यासकार
हिन्दी के आरंभिक दौर के जीवनीपरक उपन्यास और उपन्यासकार
Author(s)
रवीन्द्र कुमार सिंह
Abstractउन्नीसवीं सदी में जब हिन्दी ‘नई चाल में डली‘ और हिन्दी साहित्य ने मध्ययुगीन भाव एवं विचारधारा से आगे बढ़कर तर्क, जिज्ञासा, यथार्थबोध एवं प्रश्नाकुलता को अपने मुख्य स्वर के रूप में किया तो गद्य और गद्य के विभिन्न रूपों के स्वाभाविक विकास का रास्ता भी खुला। काल्पनिक एवं अकाल्पनिक दोनों प्रकार के गद्य रूपों ने समाज के भाव-संवेदनों, उसकी जटिलताओं और बहुछवियों को प्रस्तुत करने की कोशिश की। वह एक संक्रमण का दौर था, और उस संक्रमण काल की महत्त्वपूर्ण साहित्यिक अभिव्यक्ति के रूप में ‘उपन्यास‘ का विकास हुआ। एक विधा के रूप में इसकी स्वीकार्यता के मूल में भारतीय समाज का गल्पप्रेमी होना तो था ही, वह समाज जो अब तक कविता के जरिए कथा तत्व का आस्वाद ले रहा था, वह संस्कृत की सैंकड़ों वर्षों की सुप्त परंपरा के साथ पश्चिम से आए इस नए कथारूप में सम्मिश्रण के परिणामतः आकार ग्रहण करने वाली इस विधा को बहुत सहजता एवं प्रमुखता से स्वीकार करता है। कालक्रमेण ‘उपन्यास‘ की आंतरिक संरचना और स्वरूप में भी परिवर्तन होते गए। कथा की अनेकानेक संभावनाओं को उपन्यास के पटल पर संभव कर सकने की लेखकीय इच्छा ने इसके अलग-अलग रूपों को विकसित किया। ‘जीवनीपरक उपन्यास‘ एक ऐसा ही कथारूप है। ऐसा नहीं है कि हिन्दी साहित्य के इतिहास में जीवनीपरक उपन्यासों से पूर्व जीवनीपरक रचनाएँ नहीं हुई, जीवनी की यथातथ्यता के साथ उपन्यास की कलात्मक संभावनाओं का मणिकांचन योग ‘जीवनीपरक उपन्यास‘ में होता है। डॉ० सुरेश भीमराव गरूड़ के अनुसार ‘‘हिन्दी साहित्य में ‘जीवनी‘ तथ्यों पर आधारित ऐसी विधा है, जो किसी चरित के सम्पूर्ण जीवन वृत्त को निश्चित घटनाक्रम से अभिव्यक्त करती है। पर इसमें कलात्मकता का सौन्दर्य दृष्टिगोचर नहीं होता है। इसलिए अब रचनाकार श्रेष्ठ व्यक्तियों के जीवन वृत्त को आकर्षक ढंग से अधिक रोचक तथा पठनीय बनाने के लिए अभिनव प्रयोग कर रहे हैं। इसकी परिणति हुई है- औपन्यासिक जीवनी तथा जीवनीपरक उपन्यासों के रूप में।‘‘1
How to cite this article:
रवीन्द्र कुमार सिंह. हिन्दी के आरंभिक दौर के जीवनीपरक उपन्यास और उपन्यासकार. Int J Appl Res 2024;10(9):293-295.