Vol. 11, Issue 11, Part A (2025)
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में, मनुष्य में क्षणिक और चिरस्थायी सुख की अनुभूति और उसका श्रीमद्भगवद्गीता में समाधान
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में, मनुष्य में क्षणिक और चिरस्थायी सुख की अनुभूति और उसका श्रीमद्भगवद्गीता में समाधान
Author(s)
मनीष माणिकराव गोडे
Abstractमनुष्य का जीवन अनादि काल से ही 'सुख' की अथक खोज पर आधारित रहा है। आज के अतिआधुनिक, तीव्र गति वाले युग में, यह खोज एक जटिल पहेली बन गई है। हम एक ऐसे डिजिटल और उपभोगवादी समाज में जी रहे हैं जहाँ 'सुख' की परिभाषा लगातार बदल रही है। सोशल मीडिया पर एक 'लाइक', ऑनलाइन शॉपिंग से मिली नई वस्तु या वीकेंड पर बिताई गई पार्टी ये सब हमें क्षणिक, तात्कालिक आनंद की अनुभूति कराते हैं।
यह लेख आज के दौर में मनुष्य द्वारा अनुभव किए जाने वाले क्षणिक और चिरस्थायी सुख के द्वंद्व को समझने का प्रयास करता है। हम यह पड़ताल करेंगे कि कैसे भौतिकवादी उपलब्धियों की दौड़ और तुरंत मिलने वाले सुख की चाहत ने हमें एक ऐसे जाल में फँसा दिया है, जहाँ वास्तविक और आत्मिक संतुष्टि दूर होती जा रही है।
How to cite this article:
मनीष माणिकराव गोडे. वर्तमान परिप्रेक्ष्य में, मनुष्य में क्षणिक और चिरस्थायी सुख की अनुभूति और उसका श्रीमद्भगवद्गीता में समाधान. Int J Appl Res 2025;11(11):37-41. DOI:
10.22271/allresearch.2025.v11.i11a.12981