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International Journal of Applied Research
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ISSN Print: 2394-7500, ISSN Online: 2394-5869, CODEN: IJARPF

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Peer Reviewed Journal

Vol. 11, Issue 12, Part A (2025)

श्रीमद्भगवद्गीता, वेदों एवं उपनिषदों में ॐ तत् सत् की अवधारणा एवं उसका निरुपण

श्रीमद्भगवद्गीता, वेदों एवं उपनिषदों में ॐ तत् सत् की अवधारणा एवं उसका निरुपण

Author(s)
मनीष माणिकराव गोडे
Abstract
ॐ तत् सत् – यह ब्रह्म का त्रिगुण कथन है, इन तीन रूपों द्वारा परमात्मा इस कर्ममय सृष्टि में व्याप्त है, ऐसा भगवद्गिता में कहा गया है। इन तीनों में से ॐ यह एक गूढ संकेत माना गया है, इससे किसी भी लौकिक अर्थ का बोध नहीं हो सकता है। अतः अलौकिक, वैदिक या पारमार्थिक कर्मों में ईश्वर का स्वरूप समझने के लिये ॐ का उच्चारण करना, यह एक उत्तम क्रिया मानी जाती है। ब्रह्मवेत्ता-ऋषि स्वाध्याय, यज्ञ, दान, तप इत्यादि सभी वैदिक या पारमार्थिक कर्मों की शुरूआत ॐकार के जयघोष से करते है। उसी प्रकार तत् शब्द का अर्थ होता है – वह, इस शब्द से निष्काम कर्म का बोध होकर ऐसे कर्मों में परमात्मा का अधिष्ठान सूचित होता है। सत् शब्द का अनुप्रयोग मुख्यत: नैतिक कर्मों के विषय में होता है। इसलिये इस शब्द में नीतियुक्त कर्मों में परमात्मा का साथ दिखायी देता है। इस प्रकार इन त्रिगुणों के द्वारा परमार्थ के कर्म ईश्वर को अर्पण करने चाहिये और निष्काम वृत्ति रखनी चाहिये। स्वार्थ, परार्थ और परमार्थ अर्थात इहलोक, परलोक और मोक्ष इन तीनों स्तरों का समावेश ॐ तत्सत् इस ब्रह्म निर्देश में रह कर वैदिक धर्म के सार उसमें संकलित हो जाते है, किंतु नीतियुक्त स्वार्थ ही परार्थ या परमार्थ हो सकता है।
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How to cite this article:
मनीष माणिकराव गोडे. श्रीमद्भगवद्गीता, वेदों एवं उपनिषदों में ॐ तत् सत् की अवधारणा एवं उसका निरुपण. Int J Appl Res 2025;11(12):01-05. DOI: 10.22271/allresearch.2025.v11.i12a.13157
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