Vol. 11, Issue 3, Part E (2025)
जैविक खेती: मानव स्वास्थ्य और शुद्धता की खोज
जैविक खेती: मानव स्वास्थ्य और शुद्धता की खोज
Author(s)
डॉ. उर्वशी कोइराला
Abstract
संपूर्ण विश्व में बढ़ती हुई जनसंख्या एक गंभीर समस्या है, बढ़ती हुई जनसंख्या के साथ भोजन की आपूर्ति के लिए मानव द्वारा खाद उत्पादन कीहोड़ में अधिक से अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए तरह-तरह की रासायनिकखादों, जहरीले कीटनाशकों का उपयोग पारिस्थितिकी तंत्र (प्रकृति के जैविक और अजैविक पदार्थों के बीच आदान–प्रदान के चक्र) को प्रभावित करता है, जिससे भूमि की उर्वरा शक्ति खराब हो जाती है साथ ही वातावरण प्रदूषित होता है तथा मनुष्य के स्वास्थ्य में गिरावट आती है। भारतवर्ष में ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि है और कृषकों की मुख्य आय का साधन खेती है। हरित क्रांति के समय से बढ़ती हुई जनसंख्या को देखते हुए एवं आय की दृष्टि से उत्पादन बढ़ाना आवश्यक है। अधिक से अधिक उत्पादन के लिए खेती में अधिक मात्रा में रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों का उपयोग करना पड़ता है जिससे सामान्य व छोटे कृषक के पास कमजोत में अत्यधिक लागत लग रही है और जल भूमि वायु और वातावरण भी प्रदूषित हो रही है साथ हीखाद्य पदार्थ भी जहरीले हो रहे हैं। ऐसे में जैविक खेती मिट्टी की उर्वरता पर्यावरण संरक्षण और मानव स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभकारी है। यह पौष्टिक और रासायनिक मुक्त खाद्य पदार्थ उपलब्ध कराती है जिससे लोगों का स्वास्थ्य बेहतर होता है। वही रासायनिक खादों के अत्यधिक और अनुचित उपयोग से मिट्टी का स्वास्थ्य खराब होता है, पर्यावरण प्रदूषित होता है और मानव स्वास्थ्य पर गंभीर खतरे उत्पन्न होते हैं। इसलिए रासायनिक खादों के उपयोग में सुदृढ़ता और संतुलन बनाना आवश्यक है।टिकाऊ कृषि प्रणालियों को बढ़ावा देते हुए जैविक खादों का अधिक से अधिक उपयोग करना चाहिए ताकि स्वस्थ पर्यावरण और बेहतर मानव स्वास्थ्य सुनिश्चित किया जा सके।