Vol. 11, Issue 7, Part C (2025)
चन्द्रकिशोर जायसवाल के उपन्यासों में किस्सागोई की परंपरा
चन्द्रकिशोर जायसवाल के उपन्यासों में किस्सागोई की परंपरा
Author(s)
पवन कुमार ठाकुर
Abstract
हमारे समाज में प्रायः बुज़ुर्ग लोग किस्से सुनाते हैं। किस्से सुनाने के लिए कोई निश्चित समय नहीं होता, जब भी अवसर मिलता, वे सुना देते थे। लोग इन किस्सों को ध्यानपूर्वक सुनते थे और हँसी-खुशी के साथ उनसे बहुत कुछ सीख लेते थे। वर्तमान समय में यह परंपरा धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है। चन्द्रकिशोर जायसवाल की लेखनी की एक विशेषता यह है कि उनके पात्र अक्सर किस्सों के माध्यम से अपनी बात रखते हैं। चन्द्रकिशोर जायसवाल ग्रामीण जीवन के यथार्थ को सरल ढंग से पाठकों के बीच प्रस्तुत करते हैं। उनकी किस्सागोई में आम जन की भाषा, तर्क, व्यंग्य, हास्य और सामाजिक विडंबनाओं का गहन चित्रण मिलता है। जैसे-‘माँ’ उपन्यास में एक वृद्धा माँ की उपेक्षा का किस्सा पारिवारिक संबंधों में आ रहे बदलावों पर करारा व्यंग्य करता है। ‘सात फेरे’ उपन्यास में ‘दो गधों का किस्सा’ जिसमें भ्रमजन्य हास्य के माध्यम से सामाजिक यथार्थ पर तीखा व्यंग्य प्रस्तुत करता है। ‘सुभान मियाँ और वेश्या’ का किस्सा आदि। ऐसे अनेक किस्सों के माध्यम से लेखक समाज के टूटते रिश्तों, बदलते मानवीय व्यवहार आदि का यथार्थपरक चित्रण करते हैं। उनके किस्सागोई में लोकजीवन की आहट स्पष्ट सुनाई देती है।