Vol. 11, Issue 9, Part A (2025)
पुराणों में पुरुषार्थ चतुष्ट्य
पुराणों में पुरुषार्थ चतुष्ट्य
Author(s)
अनामिका
Abstract
पुरुषार्थ चतुष्ट्य नामक सिद्धान्त विशुद्ध भारतीय धर्म, दर्शन तथा संस्कृति की आधारशिला है। यह सिद्धान्त अन्तर्दृष्टि रखने वाले प्राचीन भारतीय ऋषियों के अथक तथा निरन्तर प्रयास का परिणाम है। भारतीय जीवनशैली एवं जीवनदर्शन को अध्यात्मपरक बनाने में इस सिद्धान्त का अतुलनीय योगदान है। अतः यह सिद्धान्त भारतीय संस्कृति के परिचयात्मक वैशिष्ट्यों में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। अन्तर्द्रष्टा ऋषिगण, धर्मशास्त्रकारों तथा दार्शनिकों के द्वारा मनुष्यों की प्रवृत्ति एवं स्वभाव को ध्यान रखते हुए पुरुषार्थ की संकल्पना की गयी है, जिसका प्रधान लक्ष्य है-परमार्थ की प्राप्ति एवं मनुष्य के भौतिक और आध्यात्मिक जीवन में संतुलन बनाना। पुरुषार्थ शब्द दो शब्दों से बना है- पुरुष एवम् अर्थ। प्रस्तुत सन्दर्भ में पुरुष का अर्थ है- विवेकशील प्राणी (मनुष्य) तथा अर्थ का तात्पर्य है- लक्ष्य। वैदिक साहित्य में कहा गया है कि मानव-जीवन की सम्पूर्ण इच्छाओं की प्राप्ति पुरुषार्थ पर ही आधारित है, इसीलिए उसको अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए कर्मशील रहना नितान्त आवश्यक है। धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष ये चारों भारतीय संस्कृति के मूल स्तम्भ हैं। जिसमें मनुष्य पुरुषार्थ रूपी मूल्यों के द्वारा अपनी जीवन-यात्रा को पूर्ण करता है। हमारी भारतीय संस्कृति मूल्यपरक होने के कारण समग्र विश्व के लिए प्रेरणा-स्रोत रही है। पुरुषार्थ उसी की विशेषता है। यह शोध पत्र में पुराणों में पुरुषार्थ चतुष्टय पर विस्तृत चर्चा है।
How to cite this article:
अनामिका. पुराणों में पुरुषार्थ चतुष्ट्य. Int J Appl Res 2025;11(9):14-16.