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International Journal of Applied Research
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ISSN Print: 2394-7500, ISSN Online: 2394-5869, CODEN: IJARPF

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International Journal of Applied Research

Vol. 1, Issue 2, Part A (2015)

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Author(s)
Dr. Nandini Samadhiya
Abstract
क) ब्रह्मचर तथा ब्रह्मलोक का महत्व:-अविनाशी वह ब्रह्मा सम्पूर्ण चराचर संसार को जाग्रत और स्वप्न के द्वारा निरन्तर निर्मित करता है और नष्ट करता है। यहाँ यह शंका उठती है कि यहाँ तो इस शास्त्र को ब्रह्मा द्वारा निर्मित कहा है कि फिर इसको मनुकृत क्यों कहा जाता है ? इस विषय में मेधातिथि का समाधान है कि शास्त्र शब्द से यहाँ विधि प्रतिषेध रूप शास्त्र के अर्थ का ग्रहण करना चाहिए। उस अर्थ को ब्रह्मा ने मनु को ग्रहण कराया था और मनु ने उस अर्थ के प्रतिपादक ग्रन्थ की रचना की। कुछ लोगों का कहना है कि जिस प्रकार वेद के अपौरुषेय होने पर भी काठक आदि संहिताओं का व्यपदेश होता है। उसी प्रकार ब्रह्मरचित होने पर भी सर्वप्रथम मनु के द्वारा मरीचि आदि के लिए प्रकाशित किये जाने के कारण इसे मनुकृत माना जाता है। किन्तु कुल्लूकभट्ट का कहना है कि वस्तुतः ब्रह्मा ने एक लाख श्लोक प्रमाण धर्मशास्त्र बनाकर मनु को पढ़ाया था और मनु ने उसका संक्षेपीकरण करके शिष्यों को प्रतिपादित किया। अतः ब्रह्मकृत कहने पर भी मनुविरचित मानने में कोई विरोध नहीं है। नारद ने भी इस शास्त्र के एक लाख श्लोक प्रमाण होने का समर्थन किया है-‘‘शतसाहस्रोऽयं ग्रन्थः।। अब यह भृगु इस सम्पूर्ण शास्त्र को तुमको सुनावेंगे। क्योंकि इस मुनि ने यह सब मुझसे अध्ययन किया है। ख्3, इसके बाद उन मनु जी के द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर महर्षि भृगु ने प्रसन्न होकर उन सभी ऋषियों से कहा -स्वयंभू (ब्रह्मपुत्र)मनु के वंश में छः अन्य मनु हुए। महान् पराक्रमी उन महात्माओं ने अपनी-अपनी प्रजा की सृष्टि की। स्वारोचिष, उत्तम, तामस, रैवत, चाक्षुप और महान् तेजस्वी वैवस्वत (ये छः मनुओं के नाम हैं)। मनु से लेकर अत्यन्त पराक्रमी सातों मनुओं ने अपने मन्वन्तरकाल में चराचर सम्पूर्ण संसार की रचना करके रक्षा की। अठारह निमेष की एक काष्ठा, तीस काष्ठा की एक कला, तीस कला का एक मुहूर्त और उतने ही मुहूर्त का एक अहोरात्र होता है। अब यहाँ से मन्वन्तर सृष्टि और प्रलय आदि के काल के ज्ञान के लिए काल का प्रमाण बताया गया है। सूर्य मनुष्य और देवताओं में दिन-रात का विभाजन करता है। रात्रि प्राणियों के सोने के लिए है और दिन कार्यों के करने के लिए है। मनुष्यों का एक माह पितरों के लिए एक अहोरात्र (दिन रात) होता है। दोनों पक्षों में से एक भाग कृष्णपक्ष कार्य करके के लिए दिन और शुक्लपक्ष सोने के लिए रात्रि होती है। एकवर्ष देवताओं का अहोरात्र होता है। वर्ष के दो हिस्सों में ऐ एक भाग उत्तरायण दिन तथा दक्षिणायण रात होती है। ब्रह्मा जी के अहोरात्र का और युगों का जो प्रमाण है वह क्रम से एक-एक करके समझो। यहाँ पर पितरों और देवताओं का कालप्रमाण वर्णित करके ब्रह्मा जी का कालप्रमाण पृथक् वर्णित किया जा रहा है वह उनके ज्ञान का पुण्यफल जानने के लिए है। क्योंकि उनके ज्ञान से पुण्य होता है। चार हजार वर्ष का एक कृत (सत) युग होता है। उतने ही सैकड़े (अर्थात् 400 वर्ष) की एक संध्या होती है और उसी प्रकार का (अर्थात् 400 वर्ष का) ही एक संध्यांश होता है।
Pages: 33-34  |  673 Views  10 Downloads
How to cite this article:
Dr. Nandini Samadhiya. euqLe`fr esa czgkpj rFkk czgkyksd dk egRo. International Journal of Applied Research. 2015; 1(2): 33-34.
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