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International Journal of Applied Research
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ISSN Print: 2394-7500, ISSN Online: 2394-5869, CODEN: IJARPF

International Journal of Applied Research

Vol. 3, Issue 1, Part A (2017)

सल्तनत काल में महिलाओं का स्वरूप

Author(s)
डाॅ. मनोरमा सिंह
Abstract
सल्तनत काल की प्रबुद्ध महिलाओं में मात्र राजनीतिक ही नहीं सांस्कृतिक जगत में भी महत्वपूर्ण कार्यों का निर्वहन किया है। नारी में देवत्व का बोध समाज ने किया है। नारी जहाँ संुदर है वहीं उसमें देवत्व भी है पुरूष और महिला दोनों के शरीर में उस आत्मा का अस्तित्व है वह नर है न नारी। दक्षिण के शैव संप्रदायों में पुरूष ही नहीं, स्त्री का भी महत्व देखने को मिलता है। आध्यात्मिक क्षेत्र में पुरूष और स्त्री में कोई भेद नहीं है। आध्यात्म जगत में जहाँ पुरूषों ने ख्याति अर्जित की है वहीं महिलाओं ने भी ख्याति अर्जित की है। दक्षिण भारतीय समाज में धर्म एवं अध्यात्म की देवी अक्कमहादेवी के विचार सर्वथा उल्लेखनीय है। उन्होंने स्त्री और पुरूष को समान रखा है। भारत में तुर्की शासन साढ़े तीन सौ वर्षों से भी कुछ अधिक चला। इस बीच में विजय तथा दमन की प्रक्रिया भी जारी रही। इसलिए इस युग में लाखों हिन्दू मारे गये लाखों का युद्धों मंे संहार हुआ और लाखों स्त्रियाँ तथा बच्चे मुसलमान बनाकर दासों के रूप में बेच दिये गये। तिमूर ने मुहम्मद तुगलक से युद्ध करने के पूर्व एक दिन में ही एक लाख हिन्दू बंदियों को कत्ल करवा दिया। हमारे देश के इतिहास के किसी भी युग में प्रारंभिक अथवा परवर्ती ब्रिटिश युग में भी मानव जीवन का इतना नृशंसतापूर्ण विनाश नहीं किया गया जितना कि तुर्क अफगान शासन के इन 350 वर्षों मंे। तुर्की सुल्तान तथा उसके प्रमुख अनुयायी समृद्ध हिन्दू परिवारों में अपने लिए पत्नियाँ प्राप्त करने के इच्छुक रहते थे, और इस हेतु वे उच्च सामंतों को अपनी लड़कियाँ देने पर विवश करते थे। मुस्लिम कानून के अनुसार इन हिन्दू लड़कियों को पहले अपने धर्म से वंचित करके मुसलमान बना लिया जाता और उनके साथ विवाह किया जाता था।
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How to cite this article:
डाॅ. मनोरमा सिंह. सल्तनत काल में महिलाओं का स्वरूप. Int J Appl Res 2017;3(1):44-49.
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