Contact: +91-9711224068
International Journal of Applied Research
  • Multidisciplinary Journal
  • Printed Journal
  • Indexed Journal
  • Refereed Journal
  • Peer Reviewed Journal

ISSN Print: 2394-7500, ISSN Online: 2394-5869, CODEN: IJARPF

IMPACT FACTOR (RJIF): 8.4

Vol. 7, Issue 10, Part E (2021)

मानव आहार तथा उचित आहार की अवधारणा

मानव आहार तथा उचित आहार की अवधारणा

Author(s)
कंचन राज
Abstract
शरीर का पोषण करनेवाने पदार्थ भोजन कहलाते है। भोजन से शरीर बनता है, पनपता है, परिपक्व होता है और परिवर्द्धित होकर सुडौल और सुगठित होता है। उचित भोजन से शरीर का स्वास्थ्य बना रहता है। प्रकृति ने जीवों को अनेक ऐसे पदार्थ प्रदान किए हैं जिन्हें वे भोजन के रूप में ग्रहण करते हैं। ये सभी भोज्य पदार्थों (Food ) की श्रेणी में आते हैं। इनकी संरचना और संगठन में पोषक तत्त्व (Nutrients) होते हैं। शरीर को इन पोषक तत्त्वोें की निरंतर जरूरत रहती है। शरीर, सोते-जागते; हर समय क्रियाशील रहता है। जब बाह्य रूप से शरीर कोई भी काम नहीं करता दिखाई देता है, तब भी वह काम करता रहता है। शरीर के कुछ भीतरी अंग उस समय भी अपना काम करते रहते हैं, जब शरीर बाह्य रूप से पूर्णतः निष्क्रिय रहता है। ये सब काम जन्म के पूर्व से शुरू हो जाते हैं और जीवनपर्यन्त चलते हैं। अतः इनके लिए भी जरूरी मात्रा में ऊर्जा और सभी पोषक तत्त्वों की, जीवनपर्यन्त आपूर्ति होते रहना जरूरी है। शरीर, जिन बाहरी कामों को करता है, वे हल्की प्रकृति के भी हो सकते हैं या भारी किस्म के भी हो सकते हैं। पेंटिंग से लेकर पत्थर तोड़ने तक, सभी कामों के लिए कमोवेष मात्रा में, ऊर्जा और पोषक तत्त्वों की जरूरत होती है। बाह्य और भीतरी सभी कामों में ऊर्जा का व्यय होता है। सेलों में निर्माण एवं टूट-फूट होती रहती है, इन क्षतियों की तुरन्त भरपाई होना जरूरी है अन्यथा शरीर को वैसी हालत में काम करना पड़ेगा, जबकी वह काम करने लायक नहीं होगा। ऐसे में शरीर के अंगों पर भारी बोझ पड़ता है और शरीर शक्तिहीन होकर अस्वस्थ हो जाता है। शरीर जवाब दे जाता है और निढाल पड़ जाता है। जो अंग सबसे अधिक बोझ का शिकार होते हैं, उनकी कार्य-क्षमताओं की तो, अपूर्णीय क्षति हो जाती है। शरीर रोगी हो जाता है और घिसट-घिसट कर जीवन की घड़ियाँ पूरी करनी पड़ती है। ऐसी हालत आ जाने को ही रोगावस्था कहा जाता है। रोग, शरीर के किसी अंग को भी प्रभावित कर सकते हैं। सामान्य स्वास्थ्य की अवस्था में, भोजन से प्राप्त, जो पोषक तत्त्व, शरीर के लिए अनिवार्य होते हैं, वही रोग से प्रभावित अंग के लिए हानिप्रद सिद्ध हो जा सकते हैं। इसीलिए ऐसी स्थिति में, सामान्य भोजन में परिवर्तन लाना जरूरी हो जाता है। रोगावस्था के लिए ऊर्जा और पोषक तत्त्वों सम्बनधी आवश्यकता में भी अन्तर आ जाता है, फलतः भोजन का तदनुरूप चयन और प्रयोग किए जाने का अत्याधिक महत्त्व है जिससे रोग बढ़ने नहीं पाए और व्यक्ति पुनः स्वास्थ्यलाभ कर सके।
Pages: 289-292  |  832 Views  97 Downloads
How to cite this article:
कंचन राज. मानव आहार तथा उचित आहार की अवधारणा. Int J Appl Res 2021;7(10):289-292.
Call for book chapter
International Journal of Applied Research
Journals List Click Here Research Journals Research Journals