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ISSN Print: 2394-7500, ISSN Online: 2394-5869, CODEN: IJARPF

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Vol. 8, Issue 2, Part H (2022)

आठवें दशक की हिन्दी कहानी में जीवन-बोध

आठवें दशक की हिन्दी कहानी में जीवन-बोध

Author(s)
डाॅ. नवाब सिंह
Abstract
साहित्य की मूल सार्थकता मनुष्य-जीवन की अभिव्यक्ति में है। जीवन के विविध रूपों और रंगों को उसकी सम्पूर्ण कमियों और विशिष्टताओं के साथ प्रस्तुत करना साहित्य का लक्ष्य होता है। निरंतर गतिशील और परिवर्तनशील परिस्थितियों से जीवन भी सतत गतिशील और परिवर्तनशील होता है। जीवन के निरंतर गतिशील और बदलाव से मूल्यों में भी बदलाव होता है। इन मूल्यों के बदलने से संस्कृति में बदलाव आता है। संस्कृति के बदलने से समाज भी गतिशील हो जाता है। इस प्रकार परिवर्तन और गतिशीलता की चक्र-प्रक्रिया निरंतर जारी रहती है। साहित्य भी अपने कथ्य और रूप के स्तर पर हर काल में इस परिवर्तन और विकास के ऐतिहासिक क्रम में निरंतर गतिमान रहता है। ऐतिहासिक विकास क्रम में मानवीय संवेदनाएं भी जटिल से जटिलतर होती जाती है। इन जटिलतर मानवीय संवेदनाओं को उसकी समग्र प्रामाणिकता और वास्तविकता में पकड़ने और प्रस्तुत करने में रचनाकर्म भी उतना ही कठिन और जटिल हो जाता है। आठवें दशक की हिन्दी कहानी इस जटिल जीवन-बोध को पकड़ने के संघर्ष में समर्थ और सफल दिखाई देती है।
Pages: 601-603  |  224 Views  111 Downloads
How to cite this article:
डाॅ. नवाब सिंह. आठवें दशक की हिन्दी कहानी में जीवन-बोध. Int J Appl Res 2022;8(2):601-603.
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